Thursday, September 24, 2026
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“पढ़ाई तुहर पारा” के अंतर्गत पहाड़ की गोद में गणित की जीवंत पाठशाला, खूँटी बनी केंद्र, रस्सी बनी त्रिज्या और बकरी ने बच्चों को समझाया वृत्त, नवाचारी शिक्षक अनिल कुमार कश्यप की पहल से कक्षा 3, 4 एवं 5 के बच्चों ने अनुभव से सीखी ज्यामिति

जशपुर। शासकीय प्राथमिक शाला पैकू में बच्चों को पुस्तकीय ज्ञान से आगे बढ़ाकर उनके आसपास के वास्तविक जीवन, प्रकृति और स्थानीय परिवेश से जोड़कर सीखने का अवसर देने के उद्देश्य से संचालित “पढ़ाई तुहर पारा” नवाचार के अंतर्गत एक अनूठी गणितीय गतिविधि आयोजित की गई। विद्यालय के नवाचारी शिक्षक अनिल कुमार कश्यप द्वारा कक्षा तीसरी, चौथी एवं पाँचवीं के बच्चों को ज्यामिति के महत्वपूर्ण विषय ‘वृत्त’ की अवधारणा समझाने के लिए कक्षा को विद्यालय भवन से बाहर पहाड़ी एवं ग्रामीण परिवेश में ले जाया गया।

इस गतिविधि की सबसे खास बात यह रही कि बच्चों को वृत्त समझाने के लिए किसी महंगे शिक्षण सहायक उपकरण की आवश्यकता नहीं पड़ी। गाँव और खेतों में रोज दिखाई देने वाली एक सामान्य व्यवस्था—खूँटी से रस्सी द्वारा बाँधी गई बकरी—को ही जीवंत गणित प्रयोगशाला में बदल दिया गया।

ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अक्सर गाय, बकरी अथवा अन्य पशुओं को चराने के लिए खुले स्थान में एक खूँटी गाड़कर रस्सी से बाँध देते हैं। पशु रस्सी की निर्धारित लंबाई तक खूँटी के चारों ओर घूमते हुए घास चरता है। शिक्षक अनिल कुमार कश्यप ने इसी स्थानीय उदाहरण को बच्चों की गणितीय अवधारणाओं से जोड़ते हुए समझाया कि बीच में लगी खूँटी वृत्त का केंद्र, खूँटी से बकरी तक तनी हुई रस्सी त्रिज्या, केंद्र से होकर एक किनारे से दूसरे किनारे तक की दूरी व्यास, बकरी द्वारा घूमते समय तय की जाने वाली बाहरी गोल सीमा परिधि तथा उस सीमा के अंदर का पूरा भाग वृत्त का क्षेत्रफल माना जा सकता है।

बच्चों को केवल देखकर समझाने के बजाय उन्हें स्वयं गतिविधि में सहभागी बनाया गया। बच्चों ने रस्सी की लंबाई मापी, केंद्र चिन्हित किया, त्रिज्या पहचानी और यह देखा कि बकरी जब रस्सी को पूरा तानकर खूँटी के चारों ओर घूमती है तो जमीन पर किस प्रकार वृत्ताकार सीमा निर्मित होती है। इसके बाद बच्चों ने स्वयं रस्सी के माध्यम से वृत्त बनाकर केंद्र, त्रिज्या, व्यास और परिधि को प्रत्यक्ष रूप से पहचाना।

गतिविधि के दौरान बच्चों से प्रश्न भी किए गए—यदि रस्सी की लंबाई बढ़ा दी जाए तो क्या होगा? यदि रस्सी आधी कर दी जाए तो चरने का क्षेत्र कितना बदल जाएगा? यदि खूँटी वही रहे और रस्सी लंबी हो जाए तो वृत्त छोटा बनेगा या बड़ा? ऐसे प्रश्नों के माध्यम से बच्चों को अनुमान लगाने, सोचने, मापने और स्वयं निष्कर्ष निकालने का अवसर मिला।

इस प्रयोग से बच्चों ने जाना कि रस्सी जितनी लंबी होगी, त्रिज्या उतनी अधिक होगी और वृत्त भी उतना बड़ा बनेगा। साथ ही उच्च कक्षाओं के बच्चों को वृत्त की परिधि और क्षेत्रफल से जुड़ी गणितीय अवधारणाओं की ओर भी सहजता से ले जाया गया। इस प्रकार बच्चों ने सूत्रों को पहले रटने के बजाय उनके पीछे छिपे अर्थ को वास्तविक जीवन में अनुभव किया।

“पढ़ाई तुहर पारा” की मूल भावना—जहाँ बच्चा, वहीं कक्षा

नवाचारी शिक्षक अनिल कुमार कश्यप के अनुसार, “पढ़ाई तुहर पारा” का उद्देश्य केवल विद्यालय की कक्षा को किसी दूसरी जगह ले जाना नहीं है, बल्कि बच्चे के आसपास उपलब्ध संसाधनों को सीखने का माध्यम बनाना है। खेत, पहाड़, दुकान, चौपाल, पेड़, रस्सी, पत्थर, मिट्टी, पशु और स्थानीय जीवन की अनेक गतिविधियाँ बच्चों के लिए जीवंत पाठ्यपुस्तक बन सकती हैं।

इसी सोच के अंतर्गत विद्यालय में बच्चों को समय-समय पर समुदाय और प्राकृतिक परिवेश में ले जाकर विभिन्न विषयों की अवधारणाओं को वास्तविक जीवन से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इससे बच्चे केवल उत्तर याद नहीं करते, बल्कि यह समझने लगते हैं कि उन्होंने जो गणित, विज्ञान अथवा भाषा विद्यालय में पढ़ी है, उसका उपयोग उनके आसपास के जीवन में कहाँ और कैसे होता है।

विशेष रूप से ग्रामीण एवं सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में इस प्रकार के शिक्षण की उपयोगिता और भी अधिक है, क्योंकि यहाँ बच्चों के अपने परिवेश में ही सीखने की असंख्य संभावनाएँ उपलब्ध हैं। आवश्यकता केवल उन्हें पहचानकर शिक्षण-अधिगम सामग्री में बदलने की है।

किताब से बाहर निकला गणित

इस गतिविधि में बच्चों के लिए सबसे उत्साहजनक अनुभव यह रहा कि जिस वृत्त को वे अब तक कॉपी में कम्पास से बनाते थे, वही वृत्त उन्होंने पहाड़ और खेत के बीच जमीन पर बनते हुए देखा। उन्होंने महसूस किया कि गणित केवल ब्लैकबोर्ड पर लिखे अंकों, रेखाओं और सूत्रों का विषय नहीं, बल्कि उनके दैनिक जीवन का एक हिस्सा है।

बच्चों की उत्सुकता उस समय और बढ़ गई जब उन्होंने खूँटी और रस्सी के माध्यम से स्वयं वृत्त बनाने का प्रयास किया। बच्चों ने एक-दूसरे से प्रश्न किए, उत्तर खोजे और अपनी भाषा में समझाया कि केंद्र क्या है, त्रिज्या किसे कहते हैं तथा बकरी किस सीमा तक घूम सकती है।

यह गतिविधि Learning by Doing, Experiential Learning एवं Activity Based Learning की अवधारणा को जमीन पर उतारने का प्रयास रही, जहाँ शिक्षक की भूमिका केवल जानकारी देने वाले की नहीं, बल्कि बच्चों को अनुभव से ज्ञान खोजने के अवसर देने वाले मार्गदर्शक की रही।

“पहाड़ की गोद में बच्चों की सीख”

खूँटी बनी केंद्र, रस्सी बनी त्रिज्या,
बकरी ने खींचा वृत्त और प्रकृति बन गई गणित की पाठशाला।

विद्यालय का प्रयास है कि “पढ़ाई तुहर पारा” जैसे नवाचारों के माध्यम से शिक्षा को बच्चों के घर, गाँव, खेत, पहाड़ और समुदाय तक पहुँचाया जाए, ताकि बच्चे यह अनुभव कर सकें कि—

“जहाँ जीवन है, वहीं सीख है और जहाँ अनुभव है, वहीं सच्ची शिक्षा है।”

नवाचार : पढ़ाई तुहर पारा – शिक्षा तुंहर द्वार
नवाचारी शिक्षक : अनिल कुमार कश्यप
शासकीय प्राथमिक शाला पैकू, विकासखंड जशपुर, जिला जशपुर, छत्तीसगढ़

Ravindra Singh Bhatia
Ravindra Singh Bhatiahttps://ppnews.in
Chief Editor PPNEWS.IN. More Details 9755884666
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