Saturday, May 25, 2024
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कांकेर लोकसभा प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण बेहद खूबसूरत,कांग्रेस और भाजपा के बीच नेताम-पोटाई की पार्टी हमर राज

रायपुर. उत्तर बस्तर कांकेर लोकसभा प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण बेहद ही खूबसूरत क्षेत्र है. केशकाल की घुमावदार घाटियों संग जंगल, पहाड़, नदियों से घिरा अपार खनिज से भरा क्षेत्र है. इस क्षेत्र में राजहरा से लेकर रावघाट तक सबसे बड़ा माइंस है. इस क्षेत्र में राजधानी से बस्तर को जोड़ने वाली एक मात्र रेल लाइन है. इस क्षेत्र में प्रदेश की सबसे बड़ी नदी, महानदी का उद्गम स्थल है. इसी क्षेत्र में साल वनों का सघन जंगल है. इस क्षेत्र में अधिकत्तर भोले-भाले आदिवासियों का बसेरा है…लेकिन इसी क्षेत्र में कुछ हद नक्सलियों का भी डेरा है. इसी क्षेत्र में पाषाण युग का पुरा अवशेष है, यह क्षेत्र सच में कई मायनों में विशेष है. और विशेष है कांकेर की राजनीति, यहाँ के आदिवासी नेता, जिन्होंने केंद्र में शीर्ष पदों पर प्रतिनिधित्व किया है, जहाँ के लोगों ने लंबे समय तक कांग्रेस का, तो दो दशक से भाजपा का साथ दिया है. लेकिन मौजूदा समय में कांकेर के लोग किसके साथ हैं ? भाजपा या कांग्रेस ? भोजराज या बीरेश ? इसी समीकरण पर आधारित है यह रिपोर्ट.

कांकेर लोकसभा क्षेत्र

अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित कांकेर लोकसभा का क्षेत्र चार जिलों तक विस्तारित है. कांकेर लोकसभा में शामिल कुल 8 विधानसभा सीटों में 6 एसटी और दो सामान्य वर्ग की हैं. इनमें- कांकेर जिला से कांकेर, अंतागढ़ और भानुप्रतापपुर, बालोद जिला से बालोद, गुंडारदेही और डौंडीलोहारा कोंडागांव जिले से केशकाल और धमतरी जिला से नगरी-सिहावा हैं.

कांकेर लोकसभा का चुनावी इतिहास

जनसंघ और जनता पार्टी

उत्तर बस्तर कांकेर लोकसभा में पहला चुनाव सन् 1967 में हुआ था. पहला चुनाव भारतीय जनसंघ के त्रिलोक लाल पियेन्द्र शाह जीते थे. गरियाबंद के छुरा निवासी टीएलपी शाह जमींदार परिवार से थे. सन् 71 के चुनाव में कांकेर इलाके में कांग्रेस का खाता खुल गया. कांग्रेस ने युवा नेता अरविंद नेताम को चुनाव लड़ाया और उन्होंने शानदार जीत दर्ज की. हालांकि आपातकाल के बाद सन् 77 के चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा. 77 में जनता पार्टी की टिकट पर अघन सिंह ठाकुर चुनाव लड़े और उन्होंने अरविंद नेताम को भारी मतों से हराकर जोरदार जीत हासिल की थी.

कांग्रेस और नेताम का वर्चस्व

सन् 1980 के चुनाव में कांग्रेस ने शानदार वापसी की और करीब दो दशक कांकेर में कांग्रेस और नेताम परिवार का ही राज रहा. सन् 1980 से लेकर 1996 तक लगातार 4 बार अरविंद नेताम सांसद रहे. उन्होंने सर्वाधिक 5 बार सांसद रहने का रिकार्ड बनाया, जिसे आज तक कोई तोड़ नहीं पाया है. अरविंद नेताम कांकेर क्षेत्र में 70 से 90 तक के दशक में सबसे मजबूत आदिवासी और कांग्रेस नेता रहे. 1996 के चुनाव में कांग्रेस ने फिर से जीत दर्ज की. 96 के चुनाव में कांग्रेस ने अरविंद नेताम की जगह उनकी पत्नी छबीला नेताम को उम्मीदवार बनाया और छबीला नेताम ने भाजपा नेता सोहन पोटाई को भारी मतों से हराकर जीत दर्ज की थी.

भाजपा का बना गढ़

सन् 1998 के चुनाव में कांकेर में भाजपा का खाता खुला और यह क्षेत्र भाजपा का गढ़ बन गया. डाक विभाग का सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति में आने वाले सोहन पोटाई भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ते रहे और जीतते रहे. सोहन पोटाई 98 से लेकर 2009 तक लगातार चार बार सांसद रहे. 98 के चुनाव में उन्होंने दिग्गज आदिवासी नेता कांग्रेस प्रत्याशी महेन्द्र कर्मा को हराया और फिर 99 में 5 बार के सांसद और दो बार के केंद्रीय मंत्री रहने वाले अरविंद नेताम को हराकर भाजपा का गढ़ कांकेर को बना दिया. पोटाई फिर 2004 और 09 में जीते और लगातार चार बार के सांसद रहे. 2014 में भाजपा नेता विक्रम उसेंडी ने जीत दर्ज की, जबकि 2019 में मोहन मंडावी ने कांग्रेस प्रत्याशी बीरेश ठाकुर को सिर्फ 7 हजार मतों से हराकर भाजपा का कब्जा बरकार रखा.

2024 का चुनाव और भाजपा-कांग्रेस का दाँव

2024 का चुनाव कांकेर लोकसभा क्षेत्र में बेहद ही दिलचस्प है. उत्तर बस्तर कांकेर लोकसभा की 8 विधानसभा में 5 सीटों पर कांग्रेस काबिज. सिर्फ 3 सीटों पर भाजपा के विधायक हैं. ऐसे में भाजपा को यहाँ कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है. हालांकि 2019 के चुनाव के दौरान कांग्रेस सभी 8 विधानसभा सीटों पर काबिज थी, फिर भी जीत भाजपा को मिली थी. लेकिन फिर भी कांग्रेस ने इस बार कांकेर सीट को जीतने के लिए पूरी ताकत लगा दी है. कांग्रेस ने 2019 में चुनाव हारने वाले बीरेश ठाकुर पर ही भरोसा जताया है, जबकि भाजपा ने मोहन मंडावी को बदलकर बैगा भोजराज को उम्मीदवार बनाया है.

भाजपा ने कांकेर सीट में कब्जा बरकरार रखने पूरी ताकत झोंक दी है. कांकेर में अमित शाह से लेकर कई बड़े नेताओं की चुनावी सभाएं पार्टी ने कराई है. कांग्रेस, आम आदमी पार्टी सहित दूसरे दलों के नाराज नेताओं को साधने में भी भाजपा सफल रही है. कांग्रेस के पूर्व विधायक शिशुपाल शोरी, पूर्व विधायक मंतूराम पवार और आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे कोमल हुपेंडी सहित सैकड़ों लोग का भाजपा प्रवेश नई रणनीति का हिस्सा है. भाजपा इसे बड़ी कामयाबी मान रही है.

दो भोजराज

दाँव-पेच के खेल में एक दाँव एक ही नाम वाले दो प्रत्याशी का भी है. इस खेल का नुकसान भाजपा को हो सकता है. क्योंकि जो एक ही नाम वाले दो प्रत्याशी हैं वो भोजराज हैं. एक भोजराज नाग भाजपा प्रत्याशी हैं, तो दूसरे भोजराज राष्ट्रीय जनसभा पार्टी के प्रत्याशी हैं.

कांग्रेस ने भी कांकेर सीट पर खास रणनीति बनाई है. प्रियंका गांधी की रैली कराकर कांग्रेस ने एक माहौल बनाने की कोशिश की है. मौजूदा 5 विधायकों के जरिए गाँव-गाँव सघन जनसंपर्क पर पार्टी ने जोर दिया है. कांग्रेस ने नाराज सर्व आदिवासी समाज को लेकर भी आंतरिक रणनीति तैयार की है. जिस पर काम गोपनीय रूप से किया जा रहा है.

सर्व आदिवासी समाज किसका बिगाड़ेगा खेला ?

कांकेर लोकसभा क्षेत्र में सर्व आदिवासी समाज का भी बड़ा प्रभाव है. समाज के संरक्षक पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम है. अरविंद नेताम ने सर्व आदिवासी समाज के बैनरतले ही हमर राज पार्टी बनाई है. नेताम की अगुवाई वाली हमर राज पार्टी भी चुनावी मैदान में है. कांकेर सहित कई सीटों पर पार्टी चुनाव लड़ रही. कांकेर लोकसभा क्षेत्र से 5 बार चुनाव जीतने वाले नेताम और 4 बार भाजपा से जीतने वाले स्व. सोहन पोटाई के समर्थक इसी पार्टी में शामिल हैं. हालांकि विधानसभा चुनाव में पार्टी बेअसर साबित हुई है. लेकिन कुछ सीटों पर हमर राज पार्टी के प्रत्याशियों ने 10 हजार तक वोट हासिल किए थे. कांकेर लोकसभा सीट से चुनावी मैदान उतरे विनोद नगावंशी बालोद विधानसभा चुनाव लड़े थे. उन्होंने करीब 10 हजार वोट हासिल किया था. बालोद भी कांकेर लोकसभा का हिस्सा है. ऐसे में हमर राज पार्टी प्रत्याशी को मिलने वाला वोट भाजपा और कांग्रेस के समीकरण बनाने और बिगाड़ने दोनों का काम कर सकता है.

नोटा अलर्ट !

चुनाव में जब से नोटा का विकल्प जनता के पास आया है. यह प्रत्याशियों को ना पंसद करने वालों का पसंदीदा हो गया है. बस्तर क्षेत्र में मतदाता नोटा को लेकर भारी जागरूक नजर आते हैं. कांकेर लोकसभा सीट में नोटा का प्रभाव 2019 के चुनाव में जोरदार देखने को मिला था. 26 हजार से अधिक मतदाताओं ने नोटा में वोट किया था. इससे किसी को बड़ा फायदा तो किसी को बड़ा नुकसान हो जाता है. क्योंकि 2019 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी करीब 7 हजार मतों से हार गया था. लिहाजा इस बार दोनों ही राष्ट्रीय दल उन हजारों मतदाताओं को लेकर भी बेहद सतर्क हैं, जो पार्टी या प्रत्याशियों को नापसंद करते हैं.

भोजराज नाग, भाजपा प्रत्याशी

भाजपा प्रत्याशी भोजराज नाग की पहचान राजनेता से कहीं ज्यादा एक आदिवासी बैगा पुजारी के तौर पर है. अंतागढ़ विधानसभा क्षेत्र के रहने वाले भोजराज भाजपा और संघ के समर्पित कार्यकर्ता हैं. बीते 3 दशक से अधिक समय से सक्रिय राजनीति में हैं. पंचायत स्तर से राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई थी. भाजपा ने 2014 के विधानसभा उपचुनाव में उन्हें टिकट दी थी और जीतकर विधायक बने थे. हालांकि 2018 में उन्हें दोबारा पार्टी ने मौका नहीं दिया और वे क्षेत्र में पार्टी के कार्यक्रमों लगे रहे. उन्होंने धर्मांतरण के खिलाफ एक आंदोलन छेड़कर रखा है. इससे उनकी चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर होने लगी. नाग अब देश भर में आदिवासी समाज में एक मुखर-प्रखर हिंदुत्व का चेहरा बन चुके हैं. पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं.

बीरेश ठाकुर, कांग्रेस प्रत्याशी

प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष बीरेश ठाकुर दूसरी बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. 2019 के चुनाव में बहुत ही मामूली अंतर से हार गए थे. मिलनसार और विवादों से दूर साफ-सुथरी छवि वाले नेता के रूप में पहचान है. सक्रिय राजनीति में करीब दो दशक से हैं. इलाके में कांग्रेस संगठन को मजबूत करने में ही जुटे रहे हैं. क्षेत्र की जनता के बीच मजबूत पकड़ वाले नेता माने जाते हैं. जमींदार परिवार से हैं. चुनाव हारने के बाद से ही क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं.

अन्य 7 और

कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों के साथ ही 7 और प्रत्याशी भी हैं. इनमें-

बसपा से तिलकराम मरकाम
सर्व आदि दल से जीवन लाल मातलाम
भारतीय शक्ति चेतना पार्टी से थाकेश माहला
राष्ट्रीय जनसभा पार्टी से भोजराम मंडावी
हमर राज पार्टी से विनोद नागवंशी
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से सुकचंद नेताम
अंबेडकर राइट पार्टी ऑफ इंडिया से सोन सिंह शामिल हैं.

मुद्दें

कांकेर लोकसभा क्षेत्र में वही मुद्दें हावी है, जो बस्तर में रहे है. कांकेर में सबसे बड़ा मुद्दा रावघाट खनन परियोजना और विस्थापन का है. इसके साथ ही बेरोजगारी और साफ पेयजल भी बड़ा मुद्दा है. सर्व आदिवासी समाज और बंगाली समाज के बीच आपसी टकराव का भी मुद्दा है. इन सबके बीच क्षेत्र में धर्मांतरण और मिशनरी पर केंद्रित मुद्दें भी सर्वाधिक चर्चा में हैं. नक्सल समस्या और पुलिस कैंप, फर्जी मुठभेड़, शिक्षा और स्वास्थय, कुपोषण यहाँ की बड़ी समस्याओं में शामिल हैं.

Ravindra Singh Bhatia
Ravindra Singh Bhatiahttps://ppnews.in
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