Thursday, February 5, 2026
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर विशेष,

गांधी_दर्शन से साभार प्रकाशित,

30 जनवरी

30 जनवरी भारत ही नहीं समूची मानवता के लिए एक बहुत ही दुखद दिन है। यह सपनों के टूटने और आशाओं के बिखरने का दिन है। आज के हो दिन सन 1948 में शाम 5 बजकर 17 मिनट पर चली तीन गोलियाँ ने न केवल एक शरीर को नहीं भेदा अपितु भारत की नैतिक चेतना, मनुष्यता की उम्मीद और भविष्य की संभावनाओं को घायल कर दिया। उस क्षण ऐसा लगा मानो इतिहास रुक गया हो, समय थम गया हो, और संसार ने अपनी दिशा खो दी हो। कन्नड़ के प्रसिद्ध कवि ने लिखा कि 30 जनवरी 1948 को भारत में जो हुआ, उसके बाद क्या हुआ यह तो मैं नहीं जानता पर एक बात निश्चित रूप से समझ गया था कि 31 जनवरी की सुबह सूरज नहीं उगेगा।

गांधी तो नहीं लौटे और 31 जनवरी की सुबह सूरज भी उगा। अर्थी से निकलकर भारत आगे भी चला । गांधी का मतलब भी यही है अंधकार से आगे निकलकर चलना। मृत्यु में से जीवन को खोज निकालना। 30 जनवरी 1948 को जो हुआ हम सब भारतवासी उसे रोक नहीं सके। यह दिवस इस बात का संकल्प भी है कि आगे हम ऐसा न होने दें। प्रायश्चित का मतलब यही है कि उसके साथ एक संकल्प भी जुड़ा हुआ है वो सिर्फ पछतावा ही नहीं है।

​30 जनवरी की शाम जब तीन गोलियां चलीं, तो वे केवल धातु के टुकड़े नहीं थे; उन्होंने एक महामानव की धवल धोती पर रक्त के ऐसे धब्बे छोड़ दिए जो कभी नहीं धुल सकते। उस रक्त रंजित तहों में टिक-टिक करती इंगरसोल घड़ी ठहर गई—मानो समय ने भी आगे बढ़ने से इनकार कर दिया हो। बापू का वह चश्मा, जो भावी भारत के सुनहरे भविष्य को देखने का माध्यम था, छिटककर दूर जा गिरा। दृश्य ऐसा था मानो सत्य और अहिंसा का मार्ग अचानक धुंधला गया हो।

हेमिंग्वे ने कहा था—”मौत और घोर विपदा के सामने सहज बने रहना ही सबसे बड़ा साहस है।” गांधी अंतिम सांस तक सहज रहे। वे जानते थे कि जिस ‘नटकला’ (रस्से पर चलना) के जरिए वे लोगों को मुक्ति दिलाना चाहते हैं, वे लोग कठिन समय में शायद साथ न दें, फिर भी वे अडिग रहे।

​गांधीजी की ‘हठधर्मिता’ उनकी अहिंसा थी। क्रोध से उबलते इतिहास ने उन्हें मार डाला और उस पर गर्व भी किया, लेकिन वे गांधी के मूल्यों को नहीं मार सके। गांधी ने वह कठिन प्रयोग किया जो सदियों में कोई एक कर पाता है। हिंसा भड़काना और धार्मिक भावनाओं से खेलना आसान है, लेकिन लाखों लोगों को संयमित, नैतिक और ‘वैष्णव जन’ बनाना अत्यंत दुष्कर कार्य है।

शायद अब भी वह समय नहीं आया है जब भारत गांधीजी की उस “सद्बुद्धि की आवाज़” को सच में सुन सके। संभव है कि जब हम विशाल कारखानों और यांत्रिक उपलब्धियों के मोह से बाहर निकलेंगे, तब जाकर व्यक्ति को वह सर्वोच्च स्थान वापस दे सकेंगे, जो गांधीजी ने अपने जीवन और विशेष रूप से अपने मृत्यु द्वारा उसे प्रदान किया।

फिर भी भारत धन्य है — क्योंकि उसने ऐसे पुत्र को जन्म दिया जिसने “गांधी” का रूप धारण किया। और शायद भारत पुनः धन्य है, क्योंकि उसी ने उसे मृत्यु दी — और इस मृत्यु ने उनके जीवन को एक ऐसी दिव्यता और उजाले से भर दिया जो युगों-युगों तक मानवता की धरोहर को समृद्ध करती रहेगी।

आज हम स्वयं को ‘गांधी के बच्चे’ कहते हैं। हमारा उत्तरदायित्व केवल उन्हें याद करना नहीं, बल्कि उस कठिन मार्ग पर चलना है जिसे उन्होंने प्रशस्त किया। गांधी आज भी हमारे बीच एक नैतिक प्रकाश पुंज की तरह मौजूद हैं, जो हमें याद दिलाते हैं कि नफरत की गोलियां एक शरीर को शांत कर सकती हैं, पर उस आत्मा को नहीं जो मानवता के कल्याण के लिए धड़कती है।

उनकी शहादत केवल एक जीवन का अंत नहीं थी । जैसा कि महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग्स ने कहा था कि जहां अंत होता है वहीं से एक नई शुरुआत होती है। गांधी का बलिदान मानवता के लिए एक नई शुरुआत है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर उन्हें शत शत नमन।

गांधी_दर्शन से साभार

Ravindra Singh Bhatia
Ravindra Singh Bhatiahttps://ppnews.in
Chief Editor PPNEWS.IN. More Details 9755884666
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