Wednesday, April 1, 2026
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आलेख: बस्तर में आज से नई शुरुआत… अब दूरदराज़ क्षेत्रों में सुशासन की जरूरत – मनोज सिंह बघेल

अब के बरस बरसों के बाद बस्तर में एक नया सवेरा हुआ है. 1 अप्रैल 2026 का दिन बस्तर अंचल के साथ-साथ दशकों से नक्सल हिंसा से प्रभावित रहे स्थानों के लिये उदया तिथि की शुरुआत मानी जाएगी. आज का सूर्योदय इन इलाकों के लिए सुनहरे दिन की शुरुआत का संकेत लेकर आया है. सालों से नक्सली दहशत के साये में दिन की शुरुआत करने वाले स्थानीय लोगों के लिए यह दिन एक नया सवेरा बनकर आया है.

नक्सली हिंसा के चलते यहां का जनजीवन दो पाटों के बीच में पिसते हुए दिखाई देता था. एक तरफ खूंखार माने जाने वाले नक्सलियों का खतरा, तो दूसरी तरफ पुलिस और सुरक्षा बलों की संदिग्ध नजरें इनके नरकीय जीवन की कहानी बन गई थी. नक्सलियों के प्रत्यक्ष प्रभाव में रहने के कारण इन इलाकों में विकासकार्य लंबे समय से बाधित रहा और स्थानीय लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल जैसे मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसते नजर आते रहे. लेकिन अब लाल आतंक के अंत के बाद इनके जीवन में सकारात्मक बदलाव की असीम संभावनाओं ने जन्म लिया है.

सशस्त्र नक्सलियों का अब सफाया

नक्सलवाद के खिलाफ पिछले दो सालों से बस्तर के अंदरूनी इलाकों में निर्णायक लड़ाई चलने के बाद सशस्त्र नक्सलियों का अब सफाया हो चुका है. भारी मात्रा में अस्त्र-शस्त्रों की बरामदगी हो चुकी है, लेकिन नक्सलियों द्वारा सालों से जंगलों में बिछाये गए लैंडमाइन अभी भी लोगों के जीवन के लिए खतरा बने हुए हैं. राज्य सरकार ने इस बात को माना है कि बारूदी सुरंगों को हटाने में करीब साल भर का समय लगेगा, इसलिये बस्तर में तैनात किए गए केन्द्रीय सुरक्षा बलों के कैंप एक साल तक वहां बने रहेंगे. बारूदी सुरंगों को हटाने के साथ ही सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय लोगों में यह विश्वास बनाये रखना है कि सरकार ही उनकी सबसे बड़ी हितैषी है, जबकि कई दशक से नक्सली उनके दिमाग में यह भाव जगाने में कहीं न कहीं सफल होते थे कि वे ही उनके सच्चे हमदर्द हैं और सरकार केवल शोषण करने वाली एक इकाई है.

नक्सलियों ने स्थानीय लोगों का किया ब्रेनवाश

दरअसल नक्सलवाद का जन्म ही इन इलाकों में शोषण के खिलाफ एक जंग के रुप में हुआ था. माओवादी विचारधारा लेकर आए बंदूकधारियों ने इसी अवधारणा के साथ इन इलाकों में प्रवेश किया था कि जल, जंगल और जमीन पर आपके अधिकारों की रक्षा वे ही कर पायेंगे. सरकारी मशीनरी को शोषण और अन्याय का पर्याय बताते हुए नक्सलियों ने स्थानीय लोगों का ब्रेनवाश किया और उन्हें माओवादी हिंसा के रास्ते अख्तियार करने के लिए प्रेरित किया और समय बीतते-बीतते नक्सली संगठनों ने बस्तर के बड़े इलाके पर अपना प्रभाव जमा लिया. अब जबकि सशस्त्र नक्सलवाद का अंत हो चुका है, सरकार की प्राथमिकता इन इलाकों पर बुनियादी सुविधाओं के तीव्र विकास के साथ साथ सरकार और जनता के बीच की दूरी कम करने की होनी चाहिये. सुशासन की अवधारणा के तहत स्थानीय लोगों की हर समस्याओं का गंभीरता से और त्वरित गति से निराकरण होना चाहिये, तब जाकर उनमें यह विश्वास जगेगा कि अब वे नक्सलवाद की काली परछाई से दूर होकर विकास की मुख्यधारा में जुड़ चुके हैं.

बस्तर संभाग की 12 विधानसभा सीटें निर्णायक

ऐसा नहीं है कि सरकारों ने इन इलाकों में विकासकार्यों के लिए ध्यान ही नहीं दिया. छत्तीसगढ़ में बस्तर संभाग की 12 विधानसभा सीटें सरकार बनाने के लिए बेहद अहम मानी जाती रही है, इसलिये चाहे किसी भी दल की सरकार रही हो, सभी ने इस ओर विशेष रुप से ध्यान देने की कोशिश की. लेकिन नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव और उनके विकास विरोधी रवैये के चलते सरकार के विकास योजनाओं की रफ्तार धीमी पड़ती रही. पिछले कुछ सालों में राज्य सरकार ने नक्सल ऑपरेशन के साथ- साथ विकासकार्यों को फोकस कर दोहरे तरीके से नक्सलवाद पर प्रहार करना शुरु किया, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए. नियद नेल्लानार सहित कई विकास योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन ने नक्सली उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. अब अधोसंरचना का तीव्र विकास और विकास योजनाओँ को जन-जन तक पहुंचाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिये.

चुनिंदा उद्योगपतियों को बस्तर सौंपने की चर्चा ने लिया जन्म

नक्सलवाद उन्मूलन के बाद एक चर्चा ने जन्म लिया है कि चुनिंदा उद्योगपतियों को बस्तर सौंपने की मंशा के तहत सरकार ने इस दिशा में तेजी से काम किया है. बस्तर उत्कृष्ट खनिज संसाधनों के मामले में बेहद समृद्ध क्षेत्र माना जाता है, इसलिए इस आशंका से इंकार भी नहीं किया जा सकता. इस मामले में सरकार को संवेदनशील रवैया अपनाना होगा और स्थानीय लोगों को विश्वास में लेकर ही खनिज संसाधनों के दोहन की नीति अख्तियार करनी होगी. राज्य के चहुंमुखी विकास के लिये खनिज संसाधनों का दोहन जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि बस्तर के भोले भाले आदिवासियों के अधिकार और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के साथ साथ ये काम हो. कुल मिलाकर नई डगर लंबी है और सरकार सहित पूरे प्रशासनिक तंत्र को संभलकर चलना होगा, तभी आने वाले समय में हम बस्तर में समग्र विकास की किरणों को सुदूर अंचल तक देख सकेंगे. अंत में हमारे साथी वैभव बेमेतरिहा द्वारा लिखी कविता की चंद लाइनों के साथ बस्तर के सुनहरे भविष्य की शुभकामनाएं देता हूं…

अबूझमाड़

बहुत अंदर तक तो नहीं,

पर दुवार तक गया हूँ,

कई-कई बार गया हूँ,

पर माड़ के लिए आज भी नया हूँ।

मैं नया (अंजान) ही रहना चाहता हूँ,

ताकि जानने की चाहत बनी रहे,

माड़ की सभ्यता

मुझ जैसे शहरियों से बची रहे।

जबरन वहाँ हम जैसे लोगों की घुसपैठ न हो,

न हो बिना अनुमति वहाँ कोई,

किसी गैर का दखल,

शोर-शराबा, दल-बल।

उनकी अपनी आदिम दुनिया,

संस्कृति-परंपरा,

रीति-रिवाज आबाद रहें,

बस हमें माड़ में जाते वक्त

यह याद रहे।

ये जल-जंगल-जमीन

सब उनका है,

उनका ही रहे।

इन पर कब,

किसका, कितना,

क्या हक हो—

यह वही तय करें।

वो जो तय करें,

वही उन्हें मिले,

हम उन्हें वो न दें

जो हम तय करें।

माड़ में सुविधा तो पहुँचे,

पर माड़ को माड़ ही रहने दें।

अबूझमाड़ को थोड़ा जानें,

थोड़ा अबूझ ही रहने दें।

Ravindra Singh Bhatia
Ravindra Singh Bhatiahttps://ppnews.in
Chief Editor PPNEWS.IN. More Details 9755884666
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