“मैं इस मुद्दे पर कभी समझौता नहीं करूंगा। इसलिए अपनी अंतिम सांस तक यह लड़ाई लड़ता रहूंगा। यह किसी राजनीतिक दल या चुनावी लाभ की लड़ाई नहीं, बल्कि सत्य, आस्था और जनहित की लड़ाई है।”
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपनी प्रस्तावित पदयात्रा की घोषणा करते हुए स्पष्ट कहा कि इस यात्रा का उद्देश्य किसी दल विशेष के खिलाफ राजनीति करना नहीं है, बल्कि देश के सामने उन मुद्दों को रखना है जिन्हें दबाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उनकी इस पदयात्रा में किसी भी राजनीतिक दल का झंडा नहीं होगा। यात्रा में केवल सभी धर्मों के प्रतीक स्वरूप उनके ध्वज साथ रहेंगे, ताकि यह संदेश जाए कि यह संघर्ष किसी पार्टी का नहीं, बल्कि न्याय, पारदर्शिता और धार्मिक आस्था की पवित्रता का है।
उन्होंने बताया कि प्रारंभिक योजना के अनुसार यह यात्रा 2 अक्टूबर से शुरू होनी थी, लेकिन समाज के विभिन्न वर्गों, संतों और शुभचिंतकों के सुझाव के बाद अब इसे दशहरे के पावन अवसर पर प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया है। जिस प्रकार उन्होंने वर्ष 2017 में अपनी ऐतिहासिक नर्मदा परिक्रमा विजयादशमी के दिन प्रारंभ की थी, उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यह नई पदयात्रा भी 20 अक्टूबर, विजयादशमी के दिन, उज्जैन से शुरू होगी। उनका कहना है कि अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देने के लिए इससे बेहतर दिन कोई और नहीं हो सकता।
दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया कि महाकाल मंदिर में बड़े स्तर पर अनियमितताएं और घोटाले हुए हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह यात्रा महाकाल मंदिर से जुड़े कथित घोटाले और राम मंदिर से जुड़े आरोपों—दोनों का सच जनता के सामने लाने के उद्देश्य से निकाली जाएगी। उनका मानना है कि धार्मिक स्थलों की पवित्रता किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार से ऊपर होनी चाहिए और यदि कहीं अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमारे राहुल गांधी भगवान शिव के भक्त हैं और स्वयं वे भगवान राम के प्रति गहरी आस्था रखते हैं। ऐसे में यदि भगवान शिव और भगवान राम से जुड़े पवित्र स्थलों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, तो यह केवल राजनीतिक विषय नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का विषय है। इसलिए इस पूरे मामले की सच्चाई देश के सामने आनी चाहिए।
दिग्विजय सिंह ने मांग की कि वर्तमान ट्रस्ट को भंग कर पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के समय गठित रामालय ट्रस्ट को पुनः स्थापित किया जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि उस ट्रस्ट में पांचों शंकराचार्यों को सदस्य बनाया जाए तथा उन्हें पांच ईमानदार अधिकारियों के नाम प्रस्तावित करने का अधिकार दिया जाए। उन नामों में से किसी एक ईमानदार अधिकारी, चाहे वह वर्तमान में सेवा में हो या सेवानिवृत्त, को मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त किया जाए, ताकि धार्मिक संस्थाओं का संचालन पूरी पारदर्शिता, जवाबदेही और श्रद्धालुओं के विश्वास के अनुरूप हो सके।
उन्होंने अंत में दोहराया कि यह यात्रा सत्ता प्राप्त करने की नहीं, बल्कि सत्य को सामने लाने, धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और जनता के विश्वास की रक्षा करने का प्रयास है। “मैं पीछे हटने वालों में से नहीं हूं। जब तक सच सामने नहीं आएगा, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा।”

