सर्व आदिवासी समाज श्री नेताम के नेतृत्व में पथलगढ़ी घटना की जांच करेगा

पत्थलगाव-पत्थरगढ़ी से उपजे विवाद के बाद भाजपा सीधे तौर पर इसे असंवैधानिक बता रही है वही कांग्रेस ने अमरजीत भगत के नेतृत्व में गठित टीम ने क्षेत्र का दौरा कर स्थिति की समीक्षा कर भाजपा पर दोषारोपण कर रही है,जनता कांग्रेस जोगी ने विधायक श्री राजेन्द्र राय के नेतृत्व में दल बना कर जांच करा रही है।

इसी बीच सर्व आदिवासी समाज की ओर से बस्तर के नेता एवम पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री अरविंद नेताम के नेतृत्व में एक दल 6 अप्रेल को क्षेत्र का दौरा करेगा तथा कलेक्टर डॉ प्रियंका शुक्ला से भेंट करेगा।

श्री नेताम 6 अप्रेल दोपहर पत्थलगाव विश्रामगृह पहुचकर बगीचा के लिए रवाना होंगे।

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आदिवासी समाज का कथन पत्थरगढ़ी के सम्बंध में

🏹🏹👏।।पत्थरगढी को लेकर मिडिया तथा कुछ राजनीतिक लोगों की शंका व विचार गलत है।।👏👏👏

🏹छत्तीसगढ़ : – छत्तीसगढ़ में आदिवासी क्षेत्रों में पत्थरगढी को लेकर जिस प्रकार से अफवाह व विवाद पैदा किया जा रहा है वह पूर्णतः गलत है, आईये जानने का प्रयास करते हैं कैसे ? –
1. यह कहा जाना कि देश से खुद को अलग राष्ट्र घोषित किया जा रहा है –
निराधार अफवाह है। यह देश लोकतांत्रिक देश है जिसमें केन्द्र में केन्द्र सरकार, राज्य में राज्य सरकार उसी प्रकार गाँव में गाँव पारंपरिक सरकार होती है, जिससे ग्राम व्यवस्था का संचालन होता है, यह गाँव राष्ट्र की प्रथम ईकाई व्यवस्था है, गाँव से ही राज्य व राष्ट्र बना है। केन्द्र में लोक सभा, राज्य में विधान सभा ,उसी प्रकार ग्राम में ग्राम सभा होता है , ग्राम सभा को अपने गाँव का प्रशासन व नियंत्रण की शक्ति है, खासकर अनुसूचित क्षेत्र में । अनुसूचित क्षेत्र में गाँव के लोग अपनी प्रशासनिक शक्ति को स्वस्फूर्त मजबूत कर रहे हैं जिसे गाँव सरकार या गाँव गणराज्य सरकार कह रहें है, इससे देश तो और मजबूत होगा। गाँव मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा।

2. देश के संविधान को न मानने का अफवाह –
आदिवासी अपने गाँव के पत्थरों में वही लिख रहे हैं जो उनके लिए संविधान में प्रावधान है, इससे स्पष्ट है कि आदिवासी अपने क्षेत्र में संविधान कोे मनवाने के लिए आंदोलित हो रहे हैं न कि संविधान के विरोध में ।यह संविधान के विरुद्ध में नहीं बल्कि संविधान के मजबूती के लिए है।

3. सरकार , प्रशासन व पुलिस को न मानने की अफवाह –
आदिवासी क्षेत्र में, सरकार, प्रशासन व पुलिस आदिवासियों का रक्षक है, इन रक्षकों का प्रथम दायित्व है कि अनुसूचित क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों का कल्याण सुरक्षित करना, फिर आदिवासियों को क्यों लग रहा है वे असुरक्षित है, उन्हें विकास के साथ साथ उनकी सांस्कृतिक मूल्यों का भी संरक्षण चाहिए , उन्हे क्यों लग रहा है कि उनके सांस्कृतिक मूल्य बाहरी लोगों के कारण खतरे में है , इसकी जिम्मेदारी सरकार की है शायद वह समझ नहीं पा रहें हैं आदिवासियों की भावना ।

4. बाहरी लोगों के प्रतिबंध पर अफवाह-
आदिवासियों की रूढी प्रथा में आदिवासियों के साथ साथ गाँव के सभी जाति वर्ग समूहों का विशेष महत्व हैं उनके ग्राम देवालय में ऒबीसी, एस सी तथा अन्य वर्ग के लोग पूजा करते हैं, सब मिलकर रहते हैं, लेकिन बाहरी उद्योग , उपनिवेश ,बाहरी विचारधारा जिससे आदिवासियों के मौलिकता को खतरा है ऐसा वे समझते हैं, आदिवासी जैसे जैसे शिक्षित व विकसित हो रहा है इन खतरों को भाॅप रहा है, आदिवासी अपने से नहीं बल्कि वे भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(5)(6) की बातें पत्थरों में लिख रहें हैं इसका मतलब यह भी संविधानिक बातें हैं । इस पर मिडिया को राजनीतिक व्यक्तियों को और अच्छे से अध्ययन करना चाहिए ।

5. संविधान की गलत व्याख्या का अफवाह –

आदिवासी समाज अपनी खुद की ठीक से व्याख्या नहीं कर पा रही है वह संविधान की कैसे गलत या सही व्याख्या करेगी? उन्हें थोड़ा पढ़लिखकर जो बातें सही लग रहा है उसे पाने के लिए आंदोलित हो रहें हैं, आंदोलन किसी के कहने या भड़काने से नहीं होता , दिल को सही लगने पर होता है, आदिवासियों को हमेशा के अज्ञानी तो नहीं रखा जा सकता , वह शिक्षित होगा तो उसके मन में हजारों सवाल पैदा होंगे, जिसका उत्तर वह खोजेगा। प्रशासन आदिवासियों के संविधानिक हितों के लिए इतनी गंभीर होती तो आज यह सवाल ही पैदा नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट है “जिसकी जमीन उसका खनिज” लेकिन मिडिया इस जजमेंट पर बात नहीं करेगी। अनुसूचित क्षेत्र में आदिवासियों को जमीन की मुआवजा के साथ साथ खनिज का मूल्य भी दिया जाना चाहिए था किन्तु इस पर कोई गंभीर नहीं है इसलिए आदिवासी सवाल कर रहा है कि उसका खनिज का मूल्य किसने खाया ?
6. सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट ” लोकसभा न विधान सभा सबसे उॅची ग्राम सभा ” लेकिन कुछ मिडिया वाले व कुछ लोग इसे आदिवासियों द्वारा बनाया गया नारा बताकर अफवाह फैलाकर आदिवासियों को देशद्रोही जैसा दिखा रहें है, यह आदिवासियों का अलगीकरण करने की साजिश जैजा दुष्प्रचार है, सरकार को अफवाह में नहीं आना चाहिए ।

7. “सावधान ! आप अनुसूचित क्षेत्र में हैं “, इस शब्द से राजनीति गरम है, यदि आप सहीं हैं तो इसमें घबराने की क्या बात , बस इतना ध्यान रखिये कि इन संविधानिक उपबंधो व अधिनियमों का अनुपालन हो। हर कार्यालय में आने जाने वालों का नाम पता, आने का कारण लिखा जाता है, यदि गाँव के लोग इस प्रकार की व्यवस्था को सुदृढ़ करना चाहते हैं तो यह बहुत अच्छी बात है, सरकार को ऐसी व्यवस्था के लिए प्रेरित करना चाहिए । इसे अनुमति लेना या अपना अपमान नहीं समझा जाना चाहिए। सम्मान समझा जाना चाहिए , गाँव वालों से आपका ब्यवहार दोस्ताना हो नहीं रौब जमाने वाला।

आदिवासियों के आंदोलन को विद्रोह कहना गलत है। आदिवासी अपनी उपेक्षा को बोल नहीं पाते , इनकी आवाज लोगों को ठीक से सुनाई नहीं देता , इसलिए उन्होंने अपनी आवाज, संविधानिक हकों को पत्थरों पर उकेर कर अपनी आवाज सरकार तक पहुॅचाने का प्रयास कर रही है, इससे इतना हायतौबा नहीं मचना चाहिए, बल्कि सरकार खुद अपनी राशि से गाँव के व आदिवासियों के संविधान शक्तियों को लिखे। जिससे आदिवासी समाज जागरूक होगा, उनका शोषण बंद होगा ।🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹
।।आंदोलन लोकतंत्र का हिस्सा है, किन्तु जब आदिवासी आंदोलन करे तो इसे ” विद्रोह ” कहना आदिवासियों के प्रति दुर्भावना व असंवेदनशीलता है।।

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