कुकुर्बिटेसी कुल की सब्जियों के प्रमुख कीट और उनका प्रबंधन

खेती किसानी की बात

कुकुर्बिटेसी कुल की सब्जियों के प्रमुख कीट और उनका प्रबंधन

1वर्षा कुमारी , 2सुनिधि मिश्रा , 3धनंजय शर्मा , 4राम किंकर साहू ,5डॉ हादी हुसैन ख़ान , 6पुष्पेंद्र सिंह साहू , सब्जी विज्ञान विभाग इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़

4राम किंकर साहू ,5 पुष्पेंद्र सिंह साहू ,
 कीट विज्ञान विभाग शुआट्स इलाहाबाद यूण्पी भारत

6डॉ हादी हुसैन ख़ान
 कीट विज्ञान विभाग क्षेत्रीय वनस्पति संगरोध केन्द्र अमृतसर पंजाब भारत

कद्दूवर्गीय सब्जियों में मुख्य तया कद्दू करेला लौकी ककड़ी तुरई पेठा परवल टिण्डा खीरा आदि प्रमुख है कद्दूवर्गीय सब्जियों का उत्पादन अच्छा होता है परन्तु बहुत से कीट एवं व्याधियाँ कद्दूवर्गीय सब्जियों के उत्पादन को प्रभावित करते है तथा कभी-कभी प्रबंधन के आभाव में पूरी फसल को नष्ट कर देते है।

अतः इन कीटों व रोगों का उचित समय पर उपयुक्त प्रबंधन करना आवश्यक है। कद्दूवर्गीय सब्जियों की फसल में लगने वाले कीट इस प्रकार हैं।

1. फल भेधक मक्खी
वैज्ञानिक नामः डैकस कुकरबिटी
पहचान तथा प्रकोप : यह मक्खी लाल-भूरे रंग की होती है। इसके सिर पर काले और सफेद धब्बे पाये जाते है। मादा लम्बी होती है तथा ना छोटा होता है। इसकी प्रकोप सम्पूर्ण भारत में पाया जात है।

मक्खी का मैगट फलों के अन्दर गूदे को खाकर नष्ट कर देता है। कभी-कभी इस कीट से 90 प्रतिषत तक क्षति होती है।
प्रबंधन – 1. कीट ग्रस्त फलों को इकट्ठा कर नष्ट कर दें।
2. फसल पर साइथिआन नामक कीटनाषी का 0.25 प्रतिषत का घोल बनाकर छिड़काव करें। यह छिड़काव फूल बनने पर ही किया जाना चाहिए।
3. जिस खेत में फसल लेनी हो उसकी जुताई मिट्टी पलटने वाल हल से करें व तेज धूप में खुला छोड़ दें, जिससे प्यूपा नष्ट हो जाएं।

2. लाल कद्दूभृंग
वैज्ञानिक नामः रैफिडो पैल्पाफोवीकोलिस
पहचान तथा प्रकोप : यह कीट नारंगी रंग का तथा काफी चमकीला होता है। इसकी लम्बाई 7 मि.मि. तथा चौड़ाई 4.5 मि.मी. होती है। प्यूपा हल्के पीले रंग का होता है। यह कीट पूरे भारत में पाया जाता है। वयस्क एवं प्यूपा दोनों ही फसल को नष्ट करते है। प्यूपा छोटे पौधों के तनों में जमीन के पास से छेद कर देते है, जिससे पौधा सूखकर नष्ट हो जाता है। वयस्क पौधों की पत्तियों को खाकर नष्ट कर देता है। इस कीट का प्रकोप बडे पैमाने पर होता है तथा रातों-रात फसल नष्ट हो जाती है। इस कीट का प्रकोप छोटे पौधों पर अधिक होता है।
प्रबंधन :- 1. उचित फसल चक्र अपनायें।
2. मिट्टी पलटने वाली हल से गहरी जुताई करें जिससे कि तेल धुप में अण्डे नष्ट हो जाएं। 3. फसलों को नवम्बर में बोदें, जिससे फरवरी-मार्च तक बेलें बड़ी हो जाएं और कीट का कोई असर न हो।
4. फसल पर अंकुरण के तुरन्त बाद से पिन नामक कीट नाषी 0.25 प्रतिषत का घोल बनाकर, छिड़काव करें।

3. ऐपीलेकना भृंग
वैज्ञानिक नामः ऐपीलैकना विजिन्शियाक्टो
पहचान तथा प्रकोप :यह भृंग हल्का पीला पर लिये हुए व छोटे आकार का होता है। भृंग क पीले रंग के होते है व सुस्त दिखाई देते है। इसकी टका प्रकोप सभी स्थानों पर होता देखा गया है। आक्रमण बहुत तेजी से होता है। इसकी टके वयस्क एवं भृंग क दोनों ही फसलों को भारी क्षति पहुंचाते है। इसके भृंग क पत्तियों के नीचे चिपके रहते है और उन्हें खुरचकर जाल-सा बना देते है। बाद में पत्तियां सूख जाती है। से मुलायम पत्तियों को ही खाते हैं। अंकुरण के बाद ही इसका प्रकोप दिखाई देता है और बहुत शीघ्र फसल नष्ट हो जाती है। जाड़े के दिनों में यह कीट किसी भी तरह की हानि नही पहुंचाता है।
प्रबंधन :-1. कीट-ग्रस्त पत्तियों को इकट्ठा करके गड्ढों में दबा दें।
2. कीट लगने पर कार्बरायल धूल का भुरकाव करें। भुरकाव सुबह के समय करना अच्छा रहता है। इससे कीटनाषी पत्तियों की सतह पर चिपक जाता है और सभी वयस्क एवं भृंगक नष्ट हो जाते है।

4. कद्दू का पिच्छली पतंगा
वैज्ञानिक नामः स्पेनार्किसकैफर
पहचान तथा प्रकोप : यह एक छोटा सा पतंगा होता है जिसके अगले दो पंख मांस लव पत्तियों की तरह के होते है। यह सुस्त होता है व धीरे-धीरे उड़ता है। इसकी प्रकोप दक्षिणी भारत में अधिक होता है। इस कीट की इल्ली पत्तियों को खाकर नष्ट कर देती है। अधिकांशतया लौकी की फसल परइस कीट का भारी आक्रमण देखा गया है। पहले कीट मुलायम पत्तियों को खाता है तथा बाद में कड़ी पत्तियों को भी। इस कीट की मादा पत्तियों, कलियों व फूलों पर अंडे देती है। अंडे बाद में फूटते है, जिनमें से इल्ली निकलती हैं। ये इल्लियां पत्तियों को खाती है।
प्रबंधन :- 1. प्रभावित पत्तियों को इकट्ठा करके नष्ट कर दिया जाए।
2. कीट ग्रस्त फसल पर सेविन, थायोडीन का 0.2 प्रतिषत घोल बनाकर छिड़काव करने से कीट नष्ट हो जाते है।

5. कुकुरबिट स्टिक बग
वैज्ञानिक नामः एस्पोंगोपसजेनस
पहचान तथा प्रकोप : यह एक बड़ा लाल-काला कीट है जो लगभग 30 मि.मि. लम्बा होता है। इस कीट का प्रकोप भारत के सभी भागों में देखा गया है। यह कीट खीरा वर्गीय फसलों के साथ-साथ भिन्डी व सावाको भी हानि पहुंचाता है। इस कीट के अर्भक वयस्क, दोनों ही पौधों से रस चूसते हैं जिससे पौधा कमजोर हो जाता है। फलतः फसल पर बुरा प्रभाव पडता है।
प्रबंधन :- 1. कीटों को पकड़कर नष्ट कर दिया जाए।
2. मैलाथियान या कार्बरायल कीट नाषक का 0.2 प्रतिषत का घोल बनाकर छिड़काव किया जाए।
3. कार्बरायल या मैलथियान धूल का 25 किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से भुरकाव किया जाए।

6. चिचिंडाका बेल बेधक कीट
वैज्ञानिक नामः मेलिट्टायूरीषिअन
पहचान तथा प्रकोप : इसकी वयस्क मघ्यम आकार का होता है। इसके पंख साफ तथा शल्कर हित होते है। इस कीट का प्रकोप दक्षिण भारत में अधिक देखा गया है। कीट की इल्लियॉं बेलों में छेद करके ऊतकों को खाती है, जिसके फलस्वरुप ग्रंथियॉं बन जाती है। एक ग्रंथि में एक ही इल्ली पाई जाती है। कीट ग्रस्त पौधों की वृद्वि रुक जाती है व उपज पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
प्रबंधन :- 1. कीट ग्रस्त पौधों को निकालकर नष्ट कर दिया जाए।
2. प्रभावित पौधों पर रोगर का 0.15 प्रतिषत घोल बनाकर छिड़काव करें।

7. करेले की पिटिका मक्खी
वैज्ञानिक नामः लेसिओप्टेरा फेलेटा
पहचान तथा प्रकोप : यह कीट मच्छर की तरह होता है। इसका प्रकोप पूरे भारत में पाया जाता है। यह लगभग सभी ककड़ी-वर्गीय फसलों को हानि पहुंचाता है। इसकी मादा लताओं पर अन्डे देती है। जिनसे बाद में मैंगट निकलकर बेल को अन्दर खाते है। क्षति ग्रस्त स्थानों पर गॉंठें बन जाती है, जिसके अन्दर मैगट होते है।
प्रबंधन :- 1. उचित फसल चक्र अपनाये जाएं।
2. आक्रमण के आरंभ में ही क्षतिग्रस्त बेलों को काटकर नष्ट कर दिया जाए।
3. फसल पर रोगर का 0.15 प्रतिषत घोल बनाकर छिड़काव किया जाए।

8. मूली का पिस्सू भृंग
वैज्ञानिक नामः फाइलोट्रेटा क्रूसिफेरी
पहचान तथा प्रकोप : इस कीट के भृंग जड़ों के पास तने में छोटे-छोटे छेद बना देते है। वयस्क कीट पौधों की पत्तियॉं खाते है। शुरु में पौधा हल्का पीला दिखाई देता है जो बाद में सूखकर नष्ट हो जाता है। इसकी प्रकोप पूरे भारत में है तथा खीरा, कद्दूवर्गीय सभी फसलों को हानि पहुंचाता है।
प्रबंधन :- 1. रोगग्रस्त पौधों को निकाल दिया जाए।
2. मैलाथियान धूलिका भुरकाव किया जाए।
3. जमीन में भृंगक के नियत्रण के लिये 10 से 15 किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से थायमेट को मृदा में मिलाया जाए।
4. थायोडान नामक रसायनों का 0.25 प्रतिषत का घोल बनाकर छिड़काव करने से भी कीट नष्ट हो जाता है।

9. पट्टीदार फफोला-भृंग
वैज्ञानिकनामः माइलेब्रिस फैलेराटा
पहचान तथा प्रकोप : यह कीट 25 से 30 मि.मी. लम्बा तथा 10 से 15 मि.मी. चौड़ा होता है। इसकी पीठ पर 3-4 चौड़ी पट्टियॉं होती है। उदर, सिर एवं टांगें काली होती है। यह कीट एकल सलसा पदार्थ छोड़ता है, जिसे कैथराइडीन अम्ल कहते है। इस अम्ल की वजह से शरीर में खुजली होती है व फफोले बन जाते है, इसीलिये इस कीट को फफोला भृंग कहते है। इस प्रकोप सभी प्रान्तों में देखा गया है। कीट के वयस्क फूल तथा पत्तियों को खाकर नष्ट कर देते है।
प्रबंधन :- 1. कीट के वयस्क को हाथ से पकड़कर कीट नाषी में डाल दिया जाता है, कीटों को पकड़ने के लिये प्रकाश पाश का भी प्रयोग किया जाता है।
2. मैलाथियान या कार्बरायल का 0.2 प्रतिषत का घोल बनाकर छिड़काव किया जाता है।
3. उचित फसल चक्र अपनाये जाएं।

10. तरबूज का एफिड
वैज्ञानिक नामः ऐफिस गोसीपीई
पहचान तथा प्रकोप : इस कीट के वयस्क छोटे तथा हरे, पीले या काले रंग के होते है। इस कीट का प्रकोप देश के सभी भागों में देखा गया है तथा खीरा-वर्गीय फसलों के अलावा अन्य फसलों पर भी देखा गया है। इस कीट के मुखांग चुभाने और चूसने वाले होते है, जो कि पत्तियों व तने से रस चूसते है। लगातार पत्तियों से रस चूसे जाने के फलस्वरुप वे पीली पड़ जाती है। रस चूसने के अलावा यह कीट एकल सलसा पदार्थ भी छोड़ता है, जिसे मधु बिन्दु कहते है। इस पदार्थ से पत्तियों पर एक काला कवक लग जाता है, जिससे पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण ढंग से नहीं हो पाता और पौधे छोटे रह जाते है। पैदावार पर भी इसका कुप्रभाव पड़ता है।
प्रबंधन :- 1. फसल पर मेटासिस्टाक्स नामक कीट नाषी का 0.15 प्रतिषत घोल बनाकर 15-15 दिन के अन्तर से छिड़काव किया जाए।
2. रोगर, न्यूवाक्रान (0.2 प्रतिषत घोल) का भी प्रयोग किया जा सकता है।

11. चिचिंडाका अर्ध-कुंडलक कीट
वैज्ञानिक नामः प्लूसियापेपोनिस
पहचान तथा प्रकोप : इसका वयस्क कीट गहरे रंग का पतंगा होता है। यह चिचिंड़ाका एक भयानक कीट है, जिसका प्रकोप देश के सभी भागों में देखा गया है। इस कीट की इल्लियां पत्तियों को काटकर मोड़ देती है और उनके अन्दर बैठकर उसे खाती रहती है। बाद में लतापत्ती-विहीन हो जाती है। इसके आक्रमण से बेल की बढ़वार रुक जाती है तथा उस पर फूल आने बंद हो जाते है।
प्रबंधन :- 1. क्षतिग्रस्त पत्तियों को इकट्ठा करके जला दिया जाता है।
2. मैलाथियान या इन्डोसल्फान का 0.2 प्रतिषत घोल बनाकर छिड़काव किया जाए।
3. उचित फसल चक्र अपनाये जाएं।

12. कद्दू की इल्ली
वैज्ञानिक नामः मार्गेरोनिया इंडिका
पहचान तथा प्रकोप : यह पंख वाला पतंगा है। पंख पारदर्शी व सफेद होते है। यह कीट पूरे देश में पाया जाता है और ककड़ी-वर्गीय सभी फसलों को हानि पहुंचाता है। इस कीट की इल्लियां एक पत्ती को दूसरी पत्ती से धागों से जोड़ देती है और फिर उनमें रहकर उसे खाती है। इल्लियां फूलों को भी खाती है तथा कभी-कभी को भी क्षति पहुंचाती है।
प्रबंधन :- 1. इल्लियों को इकट्ठाकर के नष्टकर दिया जाए।
2. मैलाथियान या इन्डोसल्फान का 0.2 प्रतिषत घोल बनाकर छिड़काव किया जाए।
3. उचित फसल चक्र अपनाये जाएं।

13. कुकरबिट माइट
वैज्ञानिक नामःयूटेट्रोनिकस ओरिएन्टेलिस
पहचान तथा प्रकोप : ये कीट बहुत ही छोटे होते है । इनकी 8 टांगें होती है। ये पत्तियों की नीचे की सतह पर बहुत संख्या में पाये जाते है। यह कीट पूरे भारत में पाया जाता है। ये पत्तियों का रस चूसते है। जिससे पत्तियॉं मुड़ जाती है और पीली पड़ जाती है। परिणामतः पौधों की बढ़वार रुक जाती है जिसका प्रभाव पैदावार पर भी पड़ता है।
प्रबंधन – 1. प्रभावित पत्तियों को तोड़कर नष्ट कर दिया जाए।
2. इन्डोसल्फान या मैलाथियन का 0.20 प्रतिषत का घोल बनाकर छिड़काव किया जाएं।

14. अन्य कीट
(क) ऐपोमेसिना पर्टीजेरा : यह कीट बेलों में छेद कर देते है, जिससे वे सूख जाती है।
(ख) ऐसियोपियस सिटुली : यह कीट फलों में छेद करता है जिससे वे नष्ट हो जाते है।
(ग) लेप्टोग्लोसस आस्ट्रेलिप : यह कीट मुलायम फलों में अपने मुखांग चुभाकर उनका रस चूसता है। फलतः फल सिकुड जाते है और बिक्री योग्य नहीं रहते।

Purvanchal prahari

Ravindra singh bhatia

9755884666

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