काव्य धारा—–वर्जनाएं नहीं सर्जनाएं गढ़ें, व्यक्ति के उन्नयन की ऋचाएं गढ़ें। दिग्भ्रमित कल्पनाएं बहुत हो चुकीं, सृष्टि के उत्कलन की दिशाएं गढ़ें। वर्जनाएं………।

एक गीत-रचना:”सत्यप्रसन्न राव”

वर्जनाएं नहीं
सर्जनाएं गढ़ें,
व्यक्ति के उन्नयन
की ऋचाएं गढ़ें।
दिग्भ्रमित कल्पनाएं
बहुत हो चुकीं,
सृष्टि के उत्कलन
की दिशाएं गढ़ें।
वर्जनाएं………।

उन्मना ही जिये तो,
भला क्या जिये,
हास्य के संफुटन
की विधायें गढ़ें।
एक सूखी नदी तो
नहीं जिंदगी
क्यों न लहरों सी
इसकी कथाएं गढ़ें।
वर्जनाएं……..।

दुःख की,क्लेश की
शोक संताप की
पुस्तिका में सुखद
भूमिकाएं गढ़ें,
स्नेह सौहार्द्र की
प्रेम सद्भाव की
श्रृंखलाबद्ध नूतन
प्रथाएं गढ़ें।
वर्जनाएं………।

टूट कर गिर पड़ी
वृक्ष की डाल को
जोड़ने की सरल
योजनाएं गढ़ें
हाथ को हाथ का
जो सहारा मिले,
शांति में क्रांति की
घोषणाएं गढ़ें।
वर्जनाएं………।

सम नहीं राह,
दूरस्थ है लक्ष्य भी,
किंतु चलिए नयी
दीपिकाएं गढ़ें।
आंधियां ना बुझा पाये
जिनको कभी,
फिर वही शाश्वती
वर्तिकाएं गढ़ें।
वर्जनाएं……….।

एक दिन हम कहें
जो वही जग सुने,
उस यजन के लिए
वेदिकाएं गढ़ें।
क्लांत हों ना, रुकें ना
कहीं हम कभी,
श्रमकणों की धवल
मौक्तिकाएं गढ़ें।
वर्जनाएं………।

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